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विदेश में हिंदू मरा तो उबाल, देश में शंकराचार्य के अपमान पर खामोशी क्यों?


कवर्धा। बांग्लादेश में एक हिंदू की हत्या के बाद भारत में तथाकथित हिंदू एकता अचानक सड़कों पर उतर आई थी। जगह-जगह विरोध प्रदर्शन, नारेबाज़ी और पुतला दहन कर इसे हिंदू अस्मिता पर हमला बताकर देशव्यापी आक्रोश खड़ा किया गया। सोशल मीडिया से लेकर सार्वजनिक मंचों तक हिंदू एकता और धर्म रक्षा के बड़े-बड़े दावे किए गए।
लेकिन आज जब प्रयागराज में एक धार्मिक आयोजन के दौरान धर्म सम्राट शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी के साथ उत्तरप्रदेश पुलिस द्वारा कथित रूप से अपमानजनक व्यवहार किए जाने का मामला सामने आया है, तब वही हिंदू समाज अजीब सी खामोशी में डूबा नजर आ रहा है। न सड़कों पर प्रदर्शन, न नारेबाज़ी और न ही धर्म रक्षा के दावे।
यह सवाल अब आम जनमानस के बीच गूंजने लगा है कि क्या हिंदू की गरिमा उसकी भौगोलिक स्थिति और सत्ता से तय होती है? क्या विदेश में हिंदू के साथ अत्याचार हो तो पूरा देश उबल पड़ता है, लेकिन अपने ही देश में शंकराचार्य जैसे सर्वोच्च धर्मगुरु के अपमान को सामान्य मान लिया जाता है?
जिस समाज ने बांग्लादेश की घटना पर उग्र प्रदर्शन किए थे, वही समाज प्रयागराज प्रकरण पर न पुतला जला रहा है, न सड़क पर उतर रहा है और न ही हिंदू एकता की बात कर रहा है। इससे यह धारणा और मजबूत होती जा रही है कि आज की हिंदू एकता सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि सुविधा और राजनीतिक चयन पर आधारित हो चुकी है।
धर्म और आस्था के बड़े मंचों से भाषण देने वाले स्वयंभू हिंदू रक्षक भी इस पूरे मामले पर मौन साधे हुए हैं। सवाल यह उठता है कि क्या यह चुप्पी इसलिए है क्योंकि मामला अपनी ही सरकार और अपनी ही पुलिस से जुड़ा हुआ है? यदि ऐसा है, तो यह स्वीकार करना पड़ेगा कि यह संघर्ष धर्म की रक्षा का नहीं, बल्कि सत्ता की स्वीकार्यता का है।
प्रयागराज की घटना ने यह कड़वा सच सामने ला दिया है कि जब संत समाज, शंकराचार्य और सनातन परंपरा पर चोट होती है, तब भी हिंदू समाज एकजुट होकर खड़ा होने से हिचक रहा है। यह केवल एक शंकराचार्य के कथित अपमान का मामला नहीं है, बल्कि पूरे हिंदू समाज की चेतना, आत्मसम्मान और वैचारिक प्रतिबद्धता की अग्निपरीक्षा है।
यदि अब भी इस विषय पर मौन बना रहा गया, तो आने वाले समय में सवाल सिर्फ सरकार और प्रशासन से नहीं, बल्कि पूरे हिंदू समाज से पूछा जाएगा कि जब अपने ही धर्मगुरुओं के सम्मान की बात आई, तब आपकी आवाज़ कहां

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