7 साल में खामोश रहे सांसद, जनता के मुद्दों पर संसद में नहीं उठी आवाज

कवर्धा,राजनांदगांव संसदीय क्षेत्र की जनता की उम्मीदों पर खरे उतरने में स्थानीय सांसद लगातार विफल साबित होते नजर आ रहे हैं। बीते 7 वर्षों के लंबे कार्यकाल में सांसद की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप है कि उन्होंने संसद में न तो क्षेत्र के अहम मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाया और न ही जनता के अधिकारों के लिए कोई ठोस लड़ाई लड़ी।
जानकारी के मुताबिक, इतने लंबे समय में सांसद द्वारा अपने संसदीय क्षेत्र के विकास के लिए कोई बड़ा प्रस्ताव या योजना पेश नहीं की गई। क्षेत्र में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दे आज भी जस के तस बने हुए हैं, लेकिन इन विषयों को लेकर संसद में कोई विशेष पहल देखने को नहीं मिली। इससे जनता के बीच निराशा और असंतोष लगातार बढ़ता जा रहा है।
बताया जाता है कि सांसद द्वारा केवल एक बार रेल लाइन की मांग जरूर रखी गई थी, जिसे क्षेत्र के विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि वह मांग भी आज तक स्वीकृति नहीं पा सकी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि मांग रखने के बाद उसे मंजूरी दिलाने के लिए जिस स्तर की सक्रियता और दबाव की जरूरत होती है, वह कहीं नजर नहीं आई। इससे यह सवाल उठता है कि क्या सांसद ने वास्तव में इस मुद्दे को गंभीरता से लिया भी था या नहीं।
ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के नागरिकों का आरोप है कि सांसद ने क्षेत्र की समस्याओं को समझने और उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर उठाने में रुचि नहीं दिखाई। कई बार स्थानीय संगठनों और आम लोगों ने अपनी समस्याएं जनप्रतिनिधि तक पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन समाधान की दिशा में कोई ठोस पहल सामने नहीं आई।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र में सांसद की भूमिका केवल प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं होती, बल्कि उन्हें अपने क्षेत्र की आवाज बनकर संसद में मजबूती से मुद्दे उठाने होते हैं। लेकिन यहां स्थिति इसके विपरीत दिखाई दे रही है, जहां सांसद की निष्क्रियता ने विकास की गति को प्रभावित किया है।
वहीं, विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर सांसद पर निशाना साधते हुए कहा है कि 7 वर्षों का समय किसी भी जनप्रतिनिधि के लिए अपनी कार्यक्षमता साबित करने के लिए पर्याप्त होता है, लेकिन यहां परिणाम शून्य नजर आ रहे हैं।
अब क्षेत्र की जनता के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि आने वाले समय में उन्हें ऐसा प्रतिनिधि चाहिए जो उनकी समस्याओं को समझे और संसद में मजबूती से उठाए। जनता यह जानना चाहती है कि आखिर इतने वर्षों में उनके हिस्से में विकास क्यों नहीं आया।
फिलहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सांसद अपनी निष्क्रियता से बाहर निकलकर जनता के विश्वास को फिर से जीत पाएंगे, या फिर यह असंतोष आगामी चुनाव में बड़ा मुद्दा बन जाएगा।




