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राजनीतिक रसूख के आगे आदेश बेअसर? लौटाए गए कर्मचारी के भरोसे चल रहा आदिवासी आश्रम, पदोन्नत अधीक्षक को आज तक नहीं मिला प्रभार



कवर्धा। आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा जारी पदोन्नति आदेश और कलेक्टर कार्यालय के स्पष्ट निर्देशों की कबीरधाम में खुली अनदेखी का मामला सामने आया है। विभाग द्वारा पदोन्नत छात्रावास अधीक्षक (श्रेणी ‘स’) अजय सिंह ठाकुर को आज तक उनके नवीन पदस्थापना स्थल आदिवासी बालक आश्रम बोड़ला का विधिवत प्रभार नहीं सौंपा गया है।

हैरानी की बात यह है कि जिस आश्रम-छात्रावास में उन्हें पदस्थ किया गया है, वहां से पूर्व प्रभारी अधीक्षक  गणपत बघेल को कलेक्टर (आदिवासी विकास) कबीरधाम द्वारा 03 नवंबर 2025 को जारी आदेश के तहत प्रशासनिक दायित्व से मुक्त करते हुए मूल विभाग (स्कूल शिक्षा विभाग) वापस भेजने के निर्देश दिए जा चुके हैं।

क्यों हटाए गए प्रभारी अधीक्षक गनपत बघेल

17 अक्टूबर 2025 को छत्तीसगढ़ खाद्य आयोग के अध्यक्ष संदीप शर्मा के निरीक्षण के दौरान आदिवासी बालक आश्रम में गणपत बघेल अनुपस्थित पाए गए थे। आयोग अध्यक्ष द्वारा देखी गई अव्यवस्था के बाद कलेक्टर ने उन्हें तत्काल प्रभाव से हटाकर मूल विभाग भेजने का आदेश जारी किया।

लिखित आदेश के बाद भी पुराने प्रभारी का कब्जा

कलेक्टर कार्यालय के आदेश के बावजूद जमीनी हकीकत यह है कि आदिवासी बालक आश्रम बोड़ला का संचालन अब भी गणपत बघेल के भरोसे चल रहा है, जबकि पदोन्नत अधीक्षक अजय सिंह ठाकुर को आज तक प्रभार नहीं दिया गया। यह स्थिति न केवल पदोन्नति आदेश, बल्कि जिला प्रशासन के निर्देशों की भी खुली अवहेलना मानी जा रही है।

राजनीतिक पहुंच का खेल?

सूत्रों का दावा है कि गणपत बघेल अपनी राजनीतिक पहुंच का लाभ उठाकर मनमानी कर रहे हैं। बताया जाता है कि उनकी पत्नी श्रीमती सुषमा बघेल, वर्तमान शासन व्यवस्था के साथ जनपद पंचायत कवर्धा की अध्यक्ष के पद पर आसीन हैं। इसी राजनीतिक रसूख के चलते आदेशों को प्रभावहीन किया जा रहा है और प्रभार हस्तांतरण को जानबूझकर रोका जा रहा है।

सूत्र यह भी बताते हैं कि संबंधित कर्मचारी कई बार आश्रम-छात्रावास में मौजूद नहीं रहते, बल्कि पत्नी के साथ राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेने पहुंच जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब अधिकारी को प्रशासनिक दायित्व से मुक्त कर दिया गया है, तो वह किस अधिकार से आश्रम-छात्रावास के संचालन में दखल दे रहा है?

आदिवासी बच्चों की व्यवस्था पर सवाल

बिना वैध प्रभारी के आश्रम-छात्रावास का संचालन होना बच्चों की सुरक्षा, भोजन, पढ़ाई, अनुशासन और वित्तीय जवाबदेही—सभी पर गंभीर सवाल खड़े करता है। विभागीय जानकार इसे महज लापरवाही नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव में नियमों को ताक पर रखने का गंभीर मामला बता रहे हैं।

शिक्षा विभाग की भूमिका पर सवाल

पूर्व प्रभारी अधीक्षक गणपत बघेल को मूल विभाग स्कूल शिक्षा में भेजा गया था, लेकिन विभाग ने उन्हें किसी वास्तविक कार्यस्थल या जिम्मेदारी से जोड़ने का ध्यान नहीं रखा। सूत्रों का कहना है कि वे घर बैठे ही तनख्वाह प्राप्त कर रहे हैं, जबकि विभागीय रिकॉर्ड में उनकी उपस्थिति दर्ज नहीं है। इस मामले में शिक्षा विभाग की कार्रवाई न केवल लापरवाही की ओर संकेत देती है, बल्कि यह भी सवाल उठाती है कि क्या नियम और आदेश लागू कराने में विभाग स्वयं भी राजनीतिक प्रभाव के आगे पस्त हो गया है।

प्रशासनिक चुप्पी पर उठते सवाल

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब पदोन्नति आदेश और कलेक्टर कार्यालय के निर्देश दोनों मौजूद हैं, तो उन्हें लागू क्यों नहीं किया जा रहा? क्या राजनीतिक प्रभाव के चलते प्रशासन मौन है?

अब देखने वाली बात होगी कि विभागीय और जिला स्तर के अधिकारी इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई कर पदोन्नत अधीक्षक को उनका वैध प्रभार सौंपते हैं, या फिर आदेश फाइलों में ही दबे रहेंगे।

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