गरीबों के लिए नहीं खुलता खजाना, प्रभावशाली लोगों तक पहुंच रही सहायता

कवर्धा। मुख्यमंत्री स्वेच्छानुदान कोष से होटल संचालक को ₹3 लाख की सहायता राशि दिए जाने के बाद शहर में सरकारी सहायता के वितरण को लेकर तीखी चर्चाएं शुरू हो गई हैं। आम लोगों का कहना है कि जब गरीब परिवार वर्षों से सहायता की आस लगाए बैठे हैं, तब अपेक्षाकृत संपन्न व्यवसायियों को राहत राशि दिए जाने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि घोटिया रोड चौड़ीकरण के दौरान अनेक गरीब परिवारों के घर और छोटे व्यवसाय प्रभावित हुए थे। कई लोगों की दुकानें टूटीं, कई परिवारों को अपना आशियाना छोड़ना पड़ा और कुछ लोग आज भी किराए के मकानों में रहने को मजबूर हैं। इसके बावजूद उन्हें किसी बड़ी आर्थिक सहायता का लाभ नहीं मिला। प्रभावित परिवारों का आरोप है कि उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं लिया गया।
लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर सहायता पाने के लिए मापदंड क्या हैं? यदि नुकसान ही आधार है तो सड़क चौड़ीकरण से प्रभावित गरीब परिवारों को राहत क्यों नहीं मिली? यदि आर्थिक संकट आधार है तो रोज कमाकर खाने वाले ठेला संचालकों, मजदूरों और छोटे व्यापारियों की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया गया?
शहर में यह चर्चा भी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ अक्सर उन्हीं लोगों तक पहुंच जाता है जिनकी पहुंच और पहचान मजबूत होती है, जबकि वास्तविक जरूरतमंद सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते रह जाते हैं। नागरिकों का कहना है कि गरीबों के लिए घोषणाएं तो बहुत होती हैं, लेकिन राहत की राशि उनके हाथ तक कम ही पहुंच पाती है।
प्रभावित परिवारों ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि घोटिया रोड चौड़ीकरण से प्रभावित लोगों की सूची सार्वजनिक की जाए और यह भी बताया जाए कि अब तक कितने लोगों को आर्थिक सहायता प्रदान की गई है। लोगों का कहना है कि पारदर्शिता नहीं होने से जनता के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
शहर में उठ रहे इन सवालों के बीच गरीब और प्रभावित परिवार अब यह जानना चाहते हैं कि क्या उनके लिए भी कभी सहायता का दरवाजा खुलेगा या सरकारी राहत केवल चुनिंदा लोगों तक ही सीमित रहेगी।




