ऑनलाइन हुआ व्यपवर्तन, लेकिन जमीनी हकीकत में फेल सिस्टम—भ्रष्टाचार बरकरार

कवर्धा। प्रदेश में भूमि व्यपवर्तन प्रक्रिया को लेकर लगातार मिल रही भ्रष्टाचार की शिकायतों के बाद शासन ने इसे पारदर्शी और सरल बनाने के उद्देश्य से ऑनलाइन प्रणाली लागू की थी। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। छत्तीसगढ़ में आज भी प्रक्रिया की जटिलताओं के कारण भ्रष्टाचार थमने का नाम नहीं ले रहा है।
सूत्रों के अनुसार, ऑनलाइन व्यवस्था लागू होने के बावजूद कई तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामियां बनी हुई हैं, जिनका सीधा फायदा सिस्टम में बैठे जिम्मेदार उठा रहे हैं। खासकर कबीरधाम जिला में एसडीएम स्तर पर प्रकरणों का समयसीमा में निराकरण नहीं होने से आवेदक परेशान हैं।
सुधार के दावे, जमीन पर फेल
शासन ने 15 दिवस के भीतर भूमि व्यपवर्तन पूर्ण करने का नियम बनाया है, ताकि लोगों को दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें। लेकिन हकीकत यह है कि अधिकारी केवल वेरिफिकेशन कर प्रक्रिया को अधूरा छोड़ दे रहे हैं।
अंतिम चरण—प्रारूप-2 अपलोड कर प्रकरण को नस्तिबद्ध करना—लंबित रखा जा रहा है। प्रकरण नस्तिबद्ध नहीं होने के कारण ऑनलाइन बी-1, पी-2 एवं नक्शा में व्यपवर्तन दर्ज नहीं हो पा रहा है। नतीजतन पूरी प्रक्रिया अधूरी रह जाती है और आवेदकों को फिर से कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
15 दिन का दावा, 2-3 महीने में भी नहीं हो रहा काम
भूमि व्यपवर्तन की जिस प्रक्रिया को शासन 15 दिवस में पूर्ण करने का दावा कर रही है, वह जमीनी स्तर पर 2 से 3 महीने तक खिंच रही है।
निवेश क्षेत्र की भूमि के लिए आवेदक को पहले LAND USE प्राप्त करना पड़ रहा है, जिसमें ही 1 से 2 माह का समय लग जा रहा है। पहले जहां आवेदक केवल एसडीएम कार्यालय के चक्कर लगाते थे, अब उन्हें नगर एवं ग्राम निवेश विभाग के भी चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
ऑटो सिस्टम भी निष्प्रभावी
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 15 दिन की समयसीमा बीतने के बाद भी ऑटोमेटिक भूमि व्यपवर्तन (Auto Diversion) की प्रक्रिया लागू नहीं हो रही है। इससे ऑनलाइन सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
NOC और LAND USE में उलझा आवेदक
निवेश क्षेत्र की भूमि के लिए अब भी नगर एवं ग्राम निवेश विभाग से NOC लेना अनिवार्य है, जबकि विभाग सीधे NOC जारी नहीं कर रहा।
वहीं, LAND USE प्रमाण पत्र के नाम पर आवेदित खसरे के बजाय पूरे मूल खसरे का सामान्य उपयोग दे दिया जाता है, जिससे आवेदक अपनी जमीन का सही उपयोग तय नहीं कर पा रहा।
भ्रष्टाचार को मिल रहा बढ़ावा
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रक्रिया की जटिलता और देरी के कारण आवेदकों को मजबूरी में सिस्टम में बैठे लोगों का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है।
अवैध निर्माण का खतरा
स्पष्ट भूमि उपयोगिता प्रमाण पत्र नहीं मिलने से यदि कोई आवेदक निर्माण करता है, तो भविष्य में उसे अवैध घोषित किए जाने का खतरा बना रहता है।
जिम्मेदारों पर सवाल
ऐसे में सवाल उठता है कि जब शासन ने पारदर्शिता के लिए ऑनलाइन प्रणाली लागू की, तो फिर जमीनी स्तर पर इसकी निगरानी और जवाबदेही क्यों नहीं सुनिश्चित की जा रही।




