प्रेस क्लब की कुर्सी, किराये की मलाई और कथित फर्जीवाड़े के गंभीर आरोप! पत्रकारों के हक पर किसका कब्जा?

कवर्धा में जिला प्रेस क्लब को लेकर विवाद गहराया, पूर्व पदाधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल; दस्तावेजों की जांच और निष्पक्ष कार्रवाई की मांग
कवर्धा। पत्रकारों के अधिकार, पारदर्शिता और न्याय की बात करने वालों को पहले अपने ही आचरण पर सवालों का जवाब देना चाहिए। जिला प्रेस क्लब कवर्धा से जुड़े विवाद में पूर्व अध्यक्ष प्रकाश वर्मा और पूर्व कोषाध्यक्ष डी.एन. योगी की भूमिका को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। आरोप है कि प्रेस क्लब के पद और भवन से जुड़े अधिकारों का इस्तेमाल निजी हितों के लिए किया गया, जबकि पत्रकारों को अपने ही नाम पर बने भवन के उपयोग से वंचित रहना पड़ा।
आरोपों के अनुसार, पिछले करीब चार वर्षों से प्रेस भवन से प्रतिमाह लगभग 25 से 30 हजार रुपये किराया वसूले जाने के बावजूद राशि प्रेस क्लब के बैंक खाते में जमा करने अथवा संस्था के अभिलेखों में विधिवत दर्ज करने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है, तो यह केवल वित्तीय पारदर्शिता का मामला नहीं, बल्कि पत्रकारों के सामूहिक हितों से जुड़ा गंभीर प्रश्न होगा। आखिर किराये से प्राप्त राशि का हिसाब कहां है और उसका उपयोग किस उद्देश्य से किया गया?
निजी कब्जे की तरह इस्तेमाल करने का आरोप
शिकायत पक्ष का आरोप है कि प्रेस क्लब के नाम से जुड़े भवन पर कुछ लोगों ने अपना एकाधिकार बनाए रखा और जिले के अन्य पत्रकारों को उनके अधिकारों से वंचित किया। सवाल यह है कि पत्रकारों के हित में निर्मित सरकारी भवन का लाभ आखिर उन्हीं पत्रकारों तक क्यों नहीं पहुंचा, जिनके लिए यह व्यवस्था की गई थी? यदि भवन सार्वजनिक उद्देश्य से बनाया गया है, तो उसके उपयोग, किराये और प्रबंधन का हिसाब भी सार्वजनिक होना चाहिए।
निर्माण, तोड़फोड़ और खबर को लेकर भी विवाद
मामले में प्रेस भवन के समीप अतिरिक्त कॉम्प्लेक्स के निर्माण और बाद में उसे तोड़े जाने को लेकर भी आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि अतिरिक्त निर्माण में लाखों रुपये खर्च हुए और इसे हटाने के संबंध में तहसीलदार द्वारा अतिक्रमण हटाए जाने की खबर प्रकाशित कराई गई, जबकि उनके अनुसार जिला प्रशासन की ओर से ऐसी कोई कार्रवाई नहीं की गई थी। इन दावों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और जिम्मेदारी तय हो।
त्यागपत्रों पर हस्ताक्षर को लेकर सबसे गंभीर सवाल
विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू आजीवन सदस्य एवं सचिव विजय धृतलहरे, उपाध्यक्ष यशवंत सिंह ठाकुर और प्रबंध समिति सदस्य श्याम टंडन के कथित त्यागपत्रों से जुड़ा है। आरोप लगाया गया है कि संबंधित पदाधिकारियों के हस्ताक्षर कूटरचित कर त्यागपत्र तैयार किए गए और उन्हें स्वीकार करने की प्रक्रिया भी स्वयं ही पूरी कर ली गई। साथ ही, परिवार के सदस्यों और रिश्तेदारों को संस्था में सदस्यता एवं पद दिए जाने पर भी सवाल उठाए गए हैं।
यदि दस्तावेजों की जांच में हस्ताक्षर कूटरचित पाए जाते हैं, तो मामला केवल संगठनात्मक विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि संभावित आपराधिक कार्रवाई का विषय भी बन सकता है। हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि सक्षम जांच और दस्तावेजों के सत्यापन के बाद ही हो सकती है।
हाईकोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेजों पर भी जांच की मांग
शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि विवाद से जुड़े दस्तावेज माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष भी प्रस्तुत किए गए हैं। अब मांग उठ रही है कि संबंधित दस्तावेजों, हस्ताक्षरों, किराये की राशि और संस्था के रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच कराई जाए। न्यायालय में दस्तावेज प्रस्तुत किए जाने मात्र से किसी आरोप की पुष्टि नहीं होती; इसलिए प्रत्येक तथ्य का विधिसम्मत परीक्षण जरूरी है।
अब सवाल जवाबदेही का है!
जिला प्रेस क्लब कवर्धा का विवाद अब केवल पद और प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं रह गया है। यह सवाल पत्रकारों के अधिकार, संस्था की पारदर्शिता और सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग से जुड़ा है। यदि किसी ने पद का दुरुपयोग किया है, किराये की राशि का हिसाब नहीं रखा है या कूटरचित दस्तावेज तैयार किए हैं, तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। वहीं, यदि आरोप निराधार हैं, तो संबंधित पक्ष को भी अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।
पत्रकारों के नाम पर बने भवन में पत्रकार ही बेगाने क्यों? किराये की राशि का हिसाब सार्वजनिक क्यों नहीं? और दस्तावेजों पर उठे सवालों की निष्पक्ष जांच कब होगी?
इन सवालों का जवाब आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि दस्तावेजों की जांच, पारदर्शिता और निष्पक्ष कानूनी कार्रवाई से ही सामने आएगा।



