स्नेहा हॉस्पिटल में घंटों डटा रहा तेंदुआ, रेस्क्यू के लिए बिलासपुर से बुलाना पड़ा शूटर

भोरमदेव अभयारण्य वाले कवर्धा में वन्यजीव रेस्क्यू की तैयारियों पर उठे सवाल, स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित ट्रैंक्विलाइजर ऑपरेटर की उपलब्धता पर मांगा जा रहा जवाब
कवर्धा। भोरमदेव अभयारण्य जैसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्र वाले कवर्धा जिले में वन्यजीवों से जुड़ी आपात स्थिति से निपटने की वन विभाग की तैयारियों पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। जिला मुख्यालय स्थित स्नेहा हॉस्पिटल परिसर में तेंदुए के घुसने की घटना ने विभाग की रेस्क्यू व्यवस्था की पोल खोलने जैसी स्थिति पैदा कर दी है। बताया जा रहा है कि तेंदुआ 3 घंटों तक अस्पताल परिसर में मौजूद रहा, जिसके चलते अस्पताल में अफरा-तफरी का माहौल बना रहा।
घटना के दौरान एक महिला के घायल होने और तेंदुए के हमले की भी जानकारी सामने आई है। हालांकि, इस संबंध में वन विभाग और पुलिस की आधिकारिक पुष्टि तथा घटना का पूरा विवरण सामने आना अभी बाकी है। घायल महिला का अस्पताल में उपचार चलने की बात बताई जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि कवर्धा जिले में तेंदुए जैसे खतरनाक वन्यजीव को तत्काल नियंत्रित करने के लिए विभाग के पास अपनी प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम और ट्रैंक्विलाइजर गन चलाने वाला विशेषज्ञ उपलब्ध है या नहीं? घटना के बाद बिलासपुर के कानन पेंडारी से शूटर बुलाए जाने की जानकारी सामने आई है। यदि यह जानकारी सही है, तो वन्यजीव बहुल जिले की तैयारियों को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अभयारण्य के बावजूद बाहरी मदद पर निर्भरता क्यों?
कवर्धा जिले में भोरमदेव अभयारण्य और आसपास के वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की मौजूदगी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे क्षेत्र में तेंदुआ, भालू या अन्य वन्यजीवों के आबादी वाले इलाकों में पहुंचने की स्थिति कभी भी उत्पन्न हो सकती है। इसके बावजूद यदि किसी आपात स्थिति में दूसरे जिले से विशेषज्ञ टीम या शूटर बुलाने की जरूरत पड़ती है, तो विभाग की तत्काल प्रतिक्रिया व्यवस्था पर सवाल खड़े होना लाजिमी है।
लोगों का सवाल है कि जब घटना जिला मुख्यालय में हुई और मामला सीधे मानव सुरक्षा से जुड़ा था, तो क्या स्थानीय स्तर पर ऐसी स्थिति से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षित कर्मचारी मौजूद थे? यदि मौजूद थे तो बाहरी शूटर को बुलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? और यदि स्थानीय स्तर पर यह व्यवस्था नहीं है, तो इतने महत्वपूर्ण वन्यजीव क्षेत्र वाले जिले में अब तक स्थायी व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
घंटों तक बना रहा खतरा, जिम्मेदारी किसकी?
अस्पताल जैसी सार्वजनिक जगह पर तेंदुए का पहुंचना सामान्य घटना नहीं है। यहां मरीज, उनके परिजन, डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ और अन्य लोग मौजूद रहते हैं। ऐसे में वन्यजीव के लंबे समय तक परिसर में रहने की स्थिति में किसी बड़े हादसे की आशंका बनी रहती है।
घटना ने यह भी सवाल खड़ा किया है कि वन विभाग के पास ऐसे संवेदनशील स्थानों के लिए तत्काल रेस्क्यू प्लान क्या है? क्या विभाग के पास पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित कर्मचारी हैं? क्या ट्रैंक्विलाइजर गन और उससे जुड़े उपकरण तत्काल उपलब्ध हैं? क्या कर्मचारियों को नियमित रूप से वन्यजीव रेस्क्यू का प्रशिक्षण दिया जाता है? इन सवालों का जवाब विभाग को सार्वजनिक रूप से देना चाहिए।
सिर्फ रेस्क्यू नहीं, भविष्य की तैयारी भी जरूरी
यह मामला केवल एक तेंदुए को पकड़ने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि भविष्य में भोरमदेव अभयारण्य अथवा जिले के किसी अन्य वन क्षेत्र से वन्यजीव आबादी वाले इलाके में प्रवेश करता है, तो उस समय विभाग कितनी तेजी से कार्रवाई करेगा, यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।
लोगों का कहना है कि वन्यजीव संरक्षण के साथ-साथ मानव सुरक्षा भी विभाग की प्राथमिक जिम्मेदारी है। इसके लिए जिले में प्रशिक्षित रेस्क्यू टीम, पर्याप्त उपकरण, ट्रैंक्विलाइजर गन के प्रशिक्षित ऑपरेटर और आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था मजबूत होना जरूरी है।
विभाग से जवाब की दरकार
स्नेहा हॉस्पिटल की घटना के बाद अब वन विभाग से कई सवालों के जवाब अपेक्षित हैं क्या कवर्धा जिले में ट्रैंक्विलाइजर गन चलाने के लिए प्रशिक्षित अधिकारी कर्मचारी उपलब्ध हैं? यदि हैं तो घटना में बिलासपुर से शूटर बुलाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? जिले में कितने वन्यजीव रेस्क्यू ऑपरेशन के लिए प्रशिक्षित कर्मचारी हैं? ट्रैंक्विलाइजर गन और अन्य रेस्क्यू उपकरण कहां उपलब्ध हैं? आपात स्थिति में विशेषज्ञ टीम को पहुंचने में कितना समय लगता है?
भोरमदेव अभयारण्य वाला कवर्धा यदि वन्यजीवों के मामले में संवेदनशील जिला है, तो फिर रेस्क्यू व्यवस्था भी उसी स्तर की होनी चाहिए। स्नेहा हॉस्पिटल की घटना ने विभाग की तैयारियों पर जो सवाल खड़े किए हैं, उनका जवाब केवल तेंदुए के रेस्क्यू से नहीं, बल्कि भविष्य के लिए ठोस व्यवस्था बनाकर दिया जाना चाहिए।




